वेद वेदांग विद्यापीठ गुरुकुल आश्रम (प्रज्ञाकुलम्)
गुरुकुल आश्रम

मनुष्य बने बनाए नहीं आते वे बनाए जाते हैं। मनुष्य बनाने के तीन कारक हैं - माता-पिता और आचार्य।

“मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेद ।”
ऋषि याज्ञवल्क्य के अनुसार: श्रेष्ठ धार्मिक, विदुषी व विद्वान माता-पिता और आचार्य के पुत्र व शिष्य ही ज्ञानी बनते हैं।

वर्तमान शिक्षा और गुरुकुल की आवश्यकता

दुर्भाग्य का विषय है कि आज शिक्षा मुक्ति के लिए न होकर नियुक्ति के लिए हो गयी है। शिक्षा को नौकरी के साथ जोड़ने पर भी नौकरी हेतु नियुक्ति होगी ही ऐसी प्रतिज्ञा कोई नहीं कर सकता। शिक्षा ज्ञान के लिए, सुख के लिए, आत्म संस्कार के लिए, आत्मबोध तथा उत्तरदायित्व व कर्तव्य बोध के लिए होती है। वर्तमान कॉलेजीय शिक्षा में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।

वर्तमान में प्रायः घरों का वातावरण तथा समाज का वातावरण शैक्षणिक व सांस्कृतिक नहीं है। माता-पिता की दिनचर्या नियमित नहीं है। जीवन में श्रेष्ठता व धार्मिकता भी प्रायः माता-पिता में नहीं है। स्कूलों का वातावरण भी पवित्र नहीं है। कामुकता चरम पर है। ऐसी स्थिति में बच्चों को संस्कारयुक्त शिक्षा दिलाने के लिए गुरुकुलों से अच्छा कोई स्थान नहीं हो सकता।

“गुरुकुलमेव शरणम्”

बच्चों के साथ मोह व तथाकथित प्यार छोड़कर गुरुकुल में प्रवेश करायें। दस वर्ष तक त्याग व तपस्या करें और जीवन के उत्तरार्द्ध को गर्व, यश और आनन्द के साथ जियें।

“नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय”

गुरुकुलीय शिक्षा के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है।

गुरुकुल की स्थापना

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में ५ सितम्बर २००६ को सुलतानपुर जनपद के धनपतगंज विकास क्षेत्र एवं थानाक्षेत्र के मझवारा ग्रामसभा में अति प्राचीन "वेद वेदाङ्ग विद्यापीठ गुरुकुल आश्रम" नामक संस्था की स्थापना सात ब्रह्मचारियों एवं एक आचार्य की टोली के साथ की गयी। इस गुरुकुल आश्रम के संस्थापक आचार्य डाॅ. शिवदत्त पाण्डेय हैं जो वर्त्तमान में वानप्रस्थ आश्रम में दीक्षित होकर मुनि "शुचिषद वानप्रस्थ" के नाम से प्रसिद्ध हैं।

हमारा उद्देश्य

यह संसार ईश्वर के द्वारा रचित है। इसलिए इसमें ईश्वर का राज्य ही चलना चाहिए। ईश्वर ने अपने इस विश्व का संविधान वेदों के रूप में हमें दिया है। ईश्वर और उसके राज्य को समझने के लिए वेदों का अध्ययन करना पड़ेगा तथा वेदों को समझने के लिए उपांग, वेदांग, उपवेद सहित वैदिक वाङ्मय का अध्ययन करना अनिवार्य है। वैदिक वाङ्मय के अध्ययन-अध्यापन के लिए ही वेद वेदांग विद्यापीठ गुरुकुल आश्रम (प्रज्ञाकुलम्) की स्थापना की गयी है।

वैदिक शिक्षा द्वारा श्रेष्ठ व्यक्तियों का निर्माण हमारा उद्देश्य है। इसके लिए नियमित दिनचर्या, योगासन, व्यायाम, प्राणायाम, संध्या, यज्ञ, वेदपाठ यहाँ का नित्य नियम है। विद्यार्थी स्नातक होने के बाद विधि द्वारा स्थापित संस्थाओं में कार्य करने का अधिकारी रहे इसके लिए बोर्ड एवं विश्वविद्यालय की परीक्षाएँ भी दिलायी जाती हैं।

मानव को जाति-पाँति, ऊँच-नीच के भेदभाव से रहित विचारशील उच्च आदर्शवान मानव बनाना हमारा लक्ष्य है। आदिशंकर से अनुप्राणित सुदृढ़ चरित्र, आत्मवान नर का निर्माण हमारा ध्येय है। जो शुभ का महत्व समझे, जो प्राणोत्सर्ग के लिए सदा तत्पर हो, जिसके तन-मन में राष्ट्र बसता हो, भारतीय संस्कृति सुवासित हो - ऐसा नर ही हमें अभीष्ट है। इसलिए इस गुरुकुल की स्थापना हुई है।

१. सनातन परम्परा के प्रदर्शक वेद, उपवेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, वेदाङ्ग, उपाङ्ग, रामायण, महाभारत, गीता, स्मृतियों इत्यादि का संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार करना।

२. समता के साथ सभी वर्णों एवं जातियों के बालकों को समान आवास, वेशभूषा, भोजन, शिक्षा व संस्कार द्वारा राष्ट्रप्रेमी चरित्रवान नागरिक तैयार करना।

३. भारतीय सनातन परम्परा के मुख्याधार स्वाध्याय, यज्ञ, योग, आयुर्वेद, धर्म का प्रायोगिक प्रचार-प्रसार करना।

४. गवादिक पशुओं का संरक्षण व संवर्धन करते हुए प्राचीन भारतीय परम्परागत कृषि प्रणाली का प्रचार-प्रसार करना।

५. जनता में प्रचलित कुरीतियों, अंधविश्वास, पाखण्ड, मादक द्रव्य सेवन एवं जन्मना जातिव्यवस्था को समाज से समाप्त करना।

आश्रम के वर्तमान प्रकल्प

१. आवासीय विद्यालय: कक्षा छह से स्नातक (शास्त्री) पर्यन्त पढ़ने-पढ़ाने की व्यवस्था वर्तमान में आश्रम में है। वर्तमान में आश्रम में 50 छात्रों के आवास-भोजन की व्यवस्था है। सभी के लिए छात्रवास की व्यवस्था है। विद्यालय भवन भी निर्मित है।

२. यज्ञशाला: आश्रम परिसर में २४ स्तम्भों की यज्ञशाला निर्मित है। इसमें प्रतिदिन दोनों समय सभी छात्र एवं आचार्यगण सन्ध्योपासना, देवयज्ञ, बलिवैश्वदेव यज्ञ, भजन एवं वेदपाठ का अभ्यास करते हैं। पर्वों व उत्सवों पर विशेष आयोजन जनता के आकर्षण के केन्द्र होते हैं।

३. पुस्तकालय: आश्रम परिसर में एक लघुकलेवर पुस्तकालय है। इसमें लगभग ५ हजार पुस्तकें संग्रहीत हैं। इससे गुरुकुलीय छात्रों एवं शोधार्थियों को विशेष लाभ प्राप्त होता है।

४. नन्दनन्दन गोशाला: आश्रम परिसर में एक गोशाला भी है जिसमें वर्तमान में 30 गोवंश का पालन-पोषण हो रहा है। गोवंश के दुग्ध का प्रयोग आश्रमवासी छात्रों व कार्यकर्तागण के लिए किया जाता है।

५. मानस आश्रम प्रकल्प: इस प्रकल्प के अन्तर्गत च्यवनप्राश, गोमय समिधा, गोमय उर्वरक, हवन सामग्री का निर्माण एवं वितरण किया जाता है। भविष्य में इसके विस्तार की योजना भी है।

६. प्रचार-प्रसार प्रकल्प: इसके अन्तर्गत चिकित्सा शिविर, प्राकृतिक चिकित्सा शिविर, योग शिविर, सम्भाषण शिविर तथा क्षेत्रीय विभिन्न ग्रामों में धर्म एवं योग का प्रचार-प्रसार किया जाता है।

७. जनकल्याण प्रकल्प: इसके अन्तर्गत वर्षभर निर्धन जनता को वस्त्र वितरण, शीत ऋतु में कम्बल वितरण, गरीब कन्याओं के विवाह में सहयोग आदि कार्य किए जाते हैं ।

उपलब्धियाँ

आश्रम से स्नातक बनकर निकले ब्रह्मचारी दिल्ली विश्वविद्यालय, राँची विश्वविद्यालय, एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय, बिहार सरकार, झारखण्ड सरकार, म.प्र. सरकार तथा राजस्थान सरकार व उ.प्र. सरकार में संस्कृत शिक्षक के रूप में विभिन्न पदों पर कार्य कर रहे हैं। देश के अनेक स्थानों में वेदपाठी ब्रह्मचारी वेदपाठ के लिए जाते हैं। आचार्य भी सारे देश में यज्ञ एवं प्रवचनों द्वारा धर्मध्वजा का उत्तोलन कर रहे हैं।

अवस्थिति (LOCATION)

यह आश्रम प्रादेशिक राजधानी लखनऊ से 135 किमी. दूर पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के 112.3 किमी. नम्बर से मात्र १०० मीटर की दूरी पर तथा राम जन्मभूमि अयोध्या से प्रयागराज मार्ग पर मात्र 45 किमी. की दूरी पर कूरेभार से धनपतगंज -मार्ग पर स्थित है। लखनऊ-वाराणसी रेलपथ पर सुलतानपुर जनपद मुख्यालय से 25 किमी. की दूरी पर धनपतगंज-कुड़वार मार्ग पर स्थित है।

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